सप्तक - मन्द्र, मध्य, तार

 

सप्तक

मन्द्र, मध्य, तार

 

सा रे ग म प ध नि इन सात स्वरों के समूह को सप्तक या स्थान कहा जाता है। सप्तक के स्वर निकलने के साथ मन्द्र सप्तक स्वर हॄदय से, मध्य स्वर सप्तक स्वर कण्ठ से तथा तार सप्तक स्वर मूर्धा से।

षड्ज की आंदोलन संख्या सप्तक में मन्द्र सा – 120, मध्य सप्तक – 240, तथा तार सा – 480

सप्तक सप्तानां समूहः। इसी का अभिप्राय संगीत में सप्त स्वरों के क्रमिक समूह के लिऐ किया गया है।


मन्द्र सप्तक

मन्द्र का अर्थ है नीचा

 

जो सप्तक मध्य सप्तक से दुगुनी नीची ध्वनि के प्रयुक्त किया जाता है , उसे मन्द्र सप्तक कहते हैं।

मन्द्र सप्तक का गायन करते वक्त उच्चारण करने से कण्ठ पर जोर पड़ता है।

मन्द्र सप्तक की पहचान स्वर के नीचे बिंदी लगाई जाती है।

भातखंडे स्वरलिपी मे मंद्र सप्तक

 

मध्य सप्तक

मध्य का अर्थ है सामान्य तथा बीच का

इसी सप्तक में गायन-वादन अधिक प्रदर्शित किया जाता है। इस सप्तक की ध्वनि मन्द्र सप्तक से दोगुनी होती है।

मध्य सप्तक का भी गायन करते वक्त उच्चारण करने से कण्ठ पर जोर पड़ता है।

मध्य सप्तक की पहचान स्वर के नीचे या ऊपर कोई भी चिन्ह लगाया नहीं जाता।

भातखंडे स्वरलिपी मे मध्य सप्तक –

सा रे नी

 

 

 

तार सप्तक


मध्य सप्तक से ऊँचा गाने या बजाने के लिए तार सप्तक के स्वरों का प्रयोग करते है।

इस सप्तक के स्वरों की ध्वनि मन्द्र सप्तक से चौगुनी तथा मध्य सप्तक से दोगुनी ऊँची होती है।

तार सप्तक का गायन करते वक्त उच्चारण करने से तालु तथा मस्तिष्क पर जोर पड़ता है।

तार सप्तक की पहचान स्वर के ऊपर बिंदी लगाई जाती है।

भातखंडे स्वरलिपी मे तार सप्तक – 

सां रें गं मं पं धं नीं सां  

 

 

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