ध्रुपद की उत्पत्ति एवं विकास

 

ध्रुपद की उत्पत्ति एवं विकास


ध्रुपद की उत्पत्ति एवं विकास


ध्रुपद उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है कुछ विद्वानों का कहना है की इस गायकी का आविष्कार १५वीं शताब्दी में ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर द्वारा किया गया परन्तु कुछ विद्वानों का कहना है की ध्रुपद १५वीं शताब्दी से पहले भी प्रचलित। राजा मानसिंह तोमर ने ध्रुपद के प्रचार में बहुत योगदान दिया। अकबर बादशाह के दरबार में जितने भी उच्च गायक थे वे सब ध्रुपद गायक थे। इन सब गायकों में तानसेन सर्वोच्च थे,जो वृन्दावन के स्वामी हरिदास के शिष्य थे। तानसेन के अतिरिक्त भी अन्य कई ध्रुपद गायक थे। जिनमें नायक बैजू, चिन्तामणी मिश्र, नायक गोपाल आदि प्रसिद्ध ध्रुपद गायक थे। ध्रुपद गायन का प्रचार एवं प्रसार मुग़ल कल में अधिक मात्रा में हुआ।

ध्रुपद के घराने  ख्याल गायकों के जिस प्रकार विभिन्न घराने आजकल प्रचलित है तथा प्रत्येक घराने की एक विशिष्ठ गायन शैली थोड़ी बहुत भिन्नता है उसी प्रकार प्राचीन काल में ध्रुपद गायन की विभिन्न गायन शैलियां प्रचलित थी। ध्रुपद गायन शैली में संगीत के शास्त्रीय नियम एक सामान होते हुए भी स्वर ले के विभिन्न प्रयोग, आवाज के लगाव, आलाप की प्रधानता अथवा अलंकार वर्ण आदि की प्रचुरता के आधार पर ध्रुपद शैली के गायकों वादकों के विभिन्न वर्ग बन गए,जिन्हें कालान्तर में वर्ग, समुदाय,परम्परा, अथवा घराना के नाम से पुकारा गया।

प्राचीन काल में प्रचलित गायन शैलियों को गीति कहकर पुकारते थे, जो कि पाँच थी।

  • शुद्धा
  • भिन्न
  • बेसरा
  • गौडी
  • साधारणी

इन गायन शैलियों का वर्णन प्राची ग्रन्थों में मिलता है,परन्तु बाद में चलकर ध्रुपद गायकों की विभिन्न गायन शैलियों का प्रचार हुआ। गायन शैलियों को बानीकहकर पुकारा जाता था। बानीका अर्थ है बानी अथवा गायकी का परम्परागत प्रकार।ये बानियाँ प्राचीन गीतियों के आधार पर नई गयी थी। ध्रुपद गायकों की मुख्य चार बानियाँ प्रचलित थी।

1- खण्डार बानी – अकबर दरबार के प्रसिद्ध बीनकर सम्मोखन सिंह नौबत खाँइस बानी के प्रवर्तक थे। उनका निवास स्थान खण्डर नामक गावँ में था,इसी से उनकी शैली खण्डारी कहलायी। आगे चलकर इस बानी के नबीर खाँ, सदरूद्दीन खाँ,अल्लादियाँ खाँ,छोटू रामदास (बनारस) आदि गायक प्रसिद्ध हुए।

2- डागुर बानी  डागुर बानी स्वामी हरिदास जी द्वारा आरम्भ हुई। परन्तु कुछ लोगों का विचार है की अकबर बादशाह के दरबार के बृजचन्द जी ने डागुर बानी की शुरुआत हुई,क्योंकि ये डागुर नमक स्थान के रहने वाले थे। परन्तु इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता है और इसलिए स्वामी हरिदास को ही इस शैली का प्रवर्तक मानना अधिक उचित है। आगे चलकर बहराम खाँ, जसरूद्दीन खाँ, नासिर मोहिनुद्दीन खाँ आदि डागुर बानी के गायक कहलाए।

3- नौहारी बानी  इस बानी के प्रवर्तक हाजी सुजानदास (जो बाद में चलकर हाजी सूजन खाँ के नाम से प्रसिद्ध हुए) मने जाते है। कहते है की हाजी सूजन खा तानसेन के दामाद थे। वे राजपूत थे तथा उनका निवास स्थान नौहारगाँव में था इसलिए इनकी शैली का नाम नौहारीपड़ा। कुछ अन्य लोगों के विचार से नौहारी बानीनव रसों से सम्बन्धित है। बाद में इस बानी के कल्लन खाँ, करामत अली खाँ, उ. विलायत हुसैन खाँ आदि गायक प्रसिद्ध हुए।

4- गोबरहार बानी  इस बानी के प्रवर्तक संगीत सम्राट तानसेन जाने जाते हैं। कहते है की तानसेन मुसलमान होने से पहले गौड़ ब्राह्मण थे और इसीलिए  शैली गौड़ी अथवा गोबरहारकहलाई। परन्तु कुछ लोगों का विचार है की इस बानी की स्थापना नायक कम्भनदास के वंशजों ने की इन लोगों के विचार से तानसेन की गायन शैली सेनिया बानी कहलायी।

आगे चलकर इन मुख्य चार बानियों के अतिरिक्त ध्रुपद की अन्य शैलियाँ प्रचार में आयी। इनमें से कुछ तौ ऊपर लिखी चार बानियाँ कि शाखाएं हैं, जैसे डागुर बानी की बनारसी शात्वा, बंगाल में प्रचलित शाखा (तानसेन की परम्परा) आदि,जिनका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।

आधुनि समय में ख्याल गायन के प्रचार के कारण ध्रुपद गायन का प्रचार दिन-प्रतिदिन काम होता जा रहा है और इसलिए अच्छे ध्रुपद भी अब काम सुनने को मिलते हैं।

· कुछ महान ध्रुपद गायक

 

·        प्राचीन ध्रुपद गायक बहराम खाँ, नसीरुद्दीन खाँ, जदुभट्ट, गोपेश्वर बैनर्जी, रहीमुद्दीन खाँ डागर, नसीर मोईनुद्दीन खाँ डागर, अमीनुद्दीन खाँ डागर, जहीरुद्दीन खाँ डागर, फ़ैयाजुद्दीन खाँ डागर, राम चतुर मालिक, सियाराम तिवारी, चन्दन चौबे इत्यादि।

·        आधुनिक ध्रुपद गायक रहीम फहिमुद्दीन डागर, वसीफुद्दीन डागर, बहउद्दीन डागर, फैयाज वसीफुद्दीन डागर, विदुर मलिक, प्रेम कुमार मलिक, अभय नारायण मलिक, फाल्गुनी मित्र, ऋत्विक सान्याल इत्यादि।

 


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