वाध्यो के प्रकार


वाध्यो के प्रकार

 

भारतीय संगीत मे वाध्यो का प्राचीन काल से हि महत्वपूर्ण स्थान राहा है। वैदिक काल, महाभारत युग, रामायण काल से लेकर आज तक अनेक वाध्यो का विकास तथा प्रचार हो चुका है। प्राचीन काल के अनेक ग्रंथो मे हमे अनेक प्रकार के वाध्यो का उल्लेख मिलता है। वाध्यो के प्रकार अनेक  है। कुछ वाद्य स्वर वाद्य है। कुछ ताल वाद्य है आदी…

इन वाध्यो को मुख्य रूप से ४ भागो मे बाटा गया है।

वाध्यो के प्रकार  –

१) तत वाध्य

२) अवनध्द वाध्य  

३) घन वाध्य  

४) सुषिर वाध्य 

 

१) तत वाध्य

 तत वाध्यो का अर्थ उन वाध्यो से है जीनमे तारो के द्वारा स्वरो कि उत्पत्ती होती है। इन वाध्यो को गज से, कोण से, लकडी से, मिजराब आदी से बजाया जाता है।

१) वीणा २) सितार ३) सरोद ४) तानपुरा ५) इकतारा ६) सारंगी ७) व्हायलिन ८) इसराज ९) दिलरुबा

 

२) अवनध्द वाध्य – 

              अवनध्द वाध्य वह वाध्य है जीनमे चमडा आदी पर आघात से ध्वनी उत्पन्न होती है। यह वाध्य ताल के लिये प्रयुक्त होते है। आम तौर पर इन वाध्यो से एक हि स्वर निकलता है।

१) तबला २) मृदंग ३) पखवाज ४) ढोलक ५) नगाडा ६) खंजरी

 

३) घन वाध्य –

              इस प्रकार के वाध्यो मे ध्वनी कि उत्पत्ती वाध्य पर आघात करने से होती है। घन वाध्य अधिकतर धातू या लकडी से बने होते है।  

१) जल तरंग २) काएट तरंग ३) झांज ४) घुंगरू

 

४) सुषिर वाध्य

              सुषिर वाध्यो मे वो वाध्य आते है जीनमे ध्वनी कि उत्पत्ती फुंक या हवा द्वारा होती है।

१) शहनाई २) बांसुरी ३) बीन ४) क्लारनेट ५) शंख ६) हार्मोनियम    

 


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