रागों का समय सिद्धांत


रागों का समय सिद्धांत

रागों का समय सिद्धांत का विस्तार पूर्वक वर्णन 

कोमल रे-ध स्वर पर आधारीत राग 

रे ध कोमल स्वरों का वर्ग सन्धि प्रकाश रागों का समय कहलाता है।
जिन रागों में रिषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयुक्त किए जाते हैं।
क्योंकि यह राग दिन और रात की सन्धि के समय मे गाए-बजाए जाते है, इस लिए इन रागों को सन्धि प्रकाश कहा जाता हैं।
24 घण्टों में इस प्रकार दो बार सन्धि काल आता हैं, प्रातः 4 बजे से सात बजे और सायं 4 बजे से 7 बजे के बीच में।
4 से 7 बजे प्रातःकाल गाए-बजाए जाने वाले रागों में रिषभ – धैवत कोमल तथा शुद्ध मध्यम का प्रयोग किया जाता है, इस लिए ये प्रातःकालीन सन्धि प्रकाश राग कहलाए जाते है। जैसे – राग भैरव
इसी प्रकार सायंकाल 4 से 7 बजे तक के बीच में गाए-बजाए जाने वाले राग सायंकालीन संधि प्रकाश  हैं, इनमें भी कोमल रिषभ और धैवत के प्रयोग के साथ तीव्र मध्यम भी लगाया जाता हैं।
सायंकालीन होने के कारण इन रागों में तीव्र मध्यम का होना आवश्यक है। जैसे – राग पूर्वी
संधि प्रकाश रागों में पूर्वी, मारवा, भैरव थाट के राग आते हैं।

रे – ध शुद्ध स्वरों पर आधारीत राग 

प्रातः 4 से 7 बजे तक गाए जाने वाले वर्गों के बाद शुद्ध रिषभ – धैवत वाले स्वरों का वर्ग आता है।
इनका समय प्रातः 7 बजे से 10 बजे या 12 बजे तक होता है। इसी प्रकार सायं 7 बजे से 12 बजे तक का होता है।
इन रागों में रिषभ व धैवत का शुद्ध होना जरूरी है क्योंकि ये दोनों स्वर जागरण के प्रतीक है तथा रागों का वांछित प्रभाव पाने के लिए इस वर्ग में शुद्ध गंधार भी आवश्यक स्वर माना जाता है।
इस वर्ग के रागों में बिलावल-कल्याण आदि थाटों के रागों का गायन-वादन किया जाता है। यही क्रम(सायं 7 से 12) चलता है।

ग नी कोमल स्वरों पर आधारीत राग

रागों के समय सिध्दांत को दर्शाने वाले स्वरों का तीसरा वर्ग कोमल गंधार निषाद का है।
इस वर्ग में भैरवी, काफी, आसावरी, तोड़ी आदि थाटों के राग गाए बजाए जाते हैं।
ग – नी कोमल वाले रागों का समय, शुद्ध रे – ध वर्ग के बाद अर्थात सायं 7 बजे से 12 बजे के बाद आता है।आर्थात 12 बजे से 4 बजे तक के बीच में होता है। ग – नी कोमल स्वर वाले राग के लिए विद्वानों का मत है कि इस वर्ग के रागों को यदि केवल गंधार वाले राग कहा जाए तो अधिक उपयुक्त होगा।
इस वर्ग के राग अधिकतर आसावरी, काफी और भैरवी थाट के राग होते है।
इन थाटों में गंधार व निषाद कोमल है किंतु इन थाटों से उत्पन्न रागों में शुद्ध निषाद भी प्रयोग लाया जाता है, जैसे तोड़ी थाट का राग मधुवंती, काफी थाट का पटदीप आदि।
इन रागों का गायन समय दोपहर 12 से 4 बजे सायं और इसी क्रम में रात्रि 12 बजे से प्रातः 4 बजे।
फिर यही क्रम प्रातः 4 से 6 बजे, 7 से 10 या 12 बजे और  12 बजे से 4 बजे तक। यही रागों का समय सिध्दांत है(the time key theory of Ragas) या रागों का समय चक्र कहा जाता है।
स्वरों द्वारा रागों का समय निर्देश करने में जो राग दिन गेय राग होते हैं, उनमें तीव्र मध्यम का प्रयोग किया जाता है।

अर्ध्वदर्शक स्वर पर आधारीत राग 

भारतीय संगीत में मध्यम ही ऐसा एक स्वर है, जो शुद्ध अवस्था से विकृत अवस्था में चढ़ता है।
इसकी स्थिति सप्तक के एकदम मध्य में है।
मध्यम की शुद्ध तथा विकृत अवस्था राग का गान समय निर्धारित करता है।
जिन रागों में तीव्र मध्यम का प्रयोग होता है वह राग दिन के 12 से रात के 12 तक गाए-बजाए जाते है।
उसी प्रकार जिन रागों में शुद्ध मध्यम अधिक लगता है, वह राग रात के 12 से दिन के 12 तक गाए-बजाए जाते है।
अतः किसी राग में मध्यम को सुनकर उसकी स्थिति देखकर उस राग के प्रातः या सायं कालीन होने का निर्णय लिया जाता है।
अतः समय निर्धारित करने में मध्यम महत्वपूर्ण भूमिका रखता है, इसी विशेषता के कारण इसे अर्ध्वदर्शक स्वर कहा जाता है।
स्वरों की संख्या के आधार पर – कई विद्वानों के अनुसार किसी राग में प्रयुक्त स्वरों की संख्या भी उस राग का गायन समय निर्धारित कर सकती है।
उदाहरण स्वरूप देखा जाए तो 5 स्वरों के औड़व राग अधिकत्तर संधि प्रकाश राग होते है। भूपाली, विभास आदि।

ऋतुओं के आधार पर गाये जानेवाले राग

रागों को भिन्न – भिन्न ऋतुओं में गाने से उनका प्रभाव अधिक होता है।
जैसे कि, बसंत एवं बहार आदि राग बसंत ऋतु में अच्छे लगते है। मल्हार आदि राग वर्षा ऋतु में अच्छे लगते हैं।

 


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