ठुमरी गायन शैली


ठुमरी गायन शैली

ठुमरी के बारे में ऐसा कहा जाता है कि जो स्वरूप आधुनिक ठुमरी का है वही स्वरूप गौड़ी गीति का हुआ करता था।
मुगल काल में इस गायन शैली को ठुमरी नाम से जाने जाना लगा।
खासकर 1850 के आसपास लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में इस ठुमरी को खास जगह मिली।
जबकि कुछ लोगों का मानना है कि उन्होंने इसे मात्र राजाश्रय दिया और उनके दरबार में ठुमरी गायन नई ऊँचाइयों तक पहुँचा क्योंकि वे खुद ‘अख्तर पिया’ के नाम से ठुमरियों की रचना करते और गाते थे।
यह मिश्रित रागों पर आधारित है और इसे सामान्यतः अर्द्ध-शास्त्रीय भारतीय संगीत माना जाता है।
ठुमरी एक भाव प्रधान एवं चंचल गीत पद्धति है।
यह गायन शैली श्रृंगार रस से ओतप्रोत रहती है।
इस में स्वर एवं ताल के साथ काव्य को प्रबल माना जाता है।
शब्दों को लालित्य पूर्ण पद्धति से गाते समय उच्चारित करते है। इसकी काव्य रचना छोटी सी होती है। ठुमरी का विकास नृत्य के साथ ही हुआ है।
ठुमरी गायन की विशेषता निर्वासन साहित्य में स्वर और लिरे के माध्यम से अलग-अलग तरीकों से भावनाओं को व्यक्त करना है, इसके लिए एक विशिष्ट ध्वनि (स्वारकाकु) बनाना है, शब्द का एक विशिष्ट तरीके से उच्चारण करना है। इसे ‘बोलबनव’ कहा जाता है।
ठुमरी दो प्रकार की होती है और उन्हें ‘बोलबांटकी ठुमरी’ और ‘बोलबनावकी ठुमरी’ के नाम से जाना जाता है।
इस गायन शैली को चंचल एवं चपल रागों में अधिकतर गाया जाता है। उदाहरण – खमाज, देश, तिलक कमोद, तिलंग, पीलू , काफी , भैरवी, झिंझोटी तथा जोगिया आदि।
इस गायन शैली में कण, मुर्की, खटका, मींड आदि से अलंकृत करते हुये गाया जाता है।
ताल – कहरवा, दादरा, दीपचन्दी, झपतालआदि।
बोल – बाँट की ठुमरी अधिकतर दीपचन्दी ताल (14 मात्रा) में गाते हैं।
16 मात्राओं की जत ताल में भी ठुमरी गायन प्रचार में है।
तीनताल में बंदिश की ठुमरी गाई जाती है।
ठुमरी गायन की पाँच अलग-अलग शैलियाँ हैं। इन्हें लखनऊ शैली, पूरब या बनारसी शैली, पंजाबी शैली, ख्याल अंग की ठुमरी और राजस्थानी अंग की ठुमरी कहाँ जाता है। 
पूरब अंग – लखनऊ तथा बनारस में पूरब अंग की ठुमरी प्रचलित है।
यहाँ की ठुमरी लोकगीतों से प्रभावित होती है।
काव्य छोटा तथा श्रृंगार रस से ओतप्रोत होता है।
धीमी लय एवं शब्दलाप का प्रयोग अधिकतर होता है।
पश्चिम अंग या पंजाब अंग की ठुमरी में भाषा ब्रज या पंजाबी होती है।
इस अंग की ठुमरी का निर्माण टप्पा गायन शैली विशेषताओं से हुई है।
ध्वनि की मधुरता, कण, मुर्की आदि का काम प्रचुर मात्रा में होता है।
ठुमरी में छोटी -छोटी तानों का प्रयोग किया जाता है।
एक ही स्वर में विभिन्न रूपों को एक साथ गाना इस अंग की अपनी ही एक विशेषता है।

ठुमरी कलाकार –

आगरा घराने के फैयाज खाँ
पटियाला घराने के बड़े गुलाम अली खाँ
ध्रुपद गायक – सिताराम तिवारी आदि।
लखनऊ शैली संदपिया, कादरपिया, अख्तरपिया, बिंदादीन महाराज, ललनपिया आदि। बनारसी शैली के मौजुद्दीन खान, भैया गणपत राव, विद्याधारी देवी, सिद्धेश्वरी देवी, रसूलनबाई आदि। पंजाबी शैली के गुलाम अली खान, ख्याल शैली के अब्दुल करीम खान और राजस्थानी शैली के हनुमान प्रसाद प्रसिद्ध गायक हैं।
गिरिजा देवी (ठुमरी की रानी), गौहर जान, बेगम अख्तर, शोभा गुर्टू, नूरजहाँ और प्रभा अत्रे ठुमरी गायन शैली के प्रमुख कलाकार हैं। 
पं. भातखंडे ने अनेकों बन्दिशों को ठुमरियों को छोटे ख्याल की तरह क्रमिक पुस्तक मालिका में लिपिबद्ध किया है।

 


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